Opinion

अनंत स्क्रॉलिंग: एक तकनीक जिसने चुपचाप हमारे हज़ारों घंटे निगल लिए

अनंत स्क्रॉलिंग ने सोशल मीडिया को कभी न खत्म होने वाली फीड में बदल दिया है। जानिए कैसे यह तकनीक हमारे समय, एकाग्रता और मानसिक शांति को चुपचाप प्रभावित कर रही है।

सिंगापुर ने हाल ही में एक अजीबोगरीब पहल शुरू की है। वहां की सरकार लोगों को किताबें पढ़ने के लिए पैसे और छोटे-मोटे इनाम दे रही है। शर्त बस इतनी है कि रोज़ पंद्रह मिनट कोई किताब पढ़नी है। इससे पहले 2015 में भी इसी देश ने लोगों को पैदल चलने के लिए मुफ्त फिटनेस घड़ियां बांटी थीं।

इन पहल के पीछे मकसद एक ही है—किसी भी तरह लोगों की नज़रें और दिमाग स्क्रीन से हटाकर वास्तविक दुनिया में वापस लाए जाएं। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि क्या आज हमें अपनी ही एकाग्रता और मानसिक शांति बचाने के लिए किसी से रिश्वत लेनी पड़ रही है?

तकनीक के तेज़ी से होते विकास के बीच लोगों का बढ़ता स्क्रीन टाइम अब एक गंभीर चिंता का विषय बन चुका है।

दुनिया भर के ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि आज एक औसत इंटरनेट यूज़र रोज़ाना करीब दो घंटे इक्कीस मिनट सोशल मीडिया पर बिताता है। दिन की भागदौड़ में शायद ये दो घंटे बहुत बड़े न लगें, लेकिन जब आप इसे साल भर के पैमाने पर तौलते हैं, तो यह लगभग 858 घंटे यानी पूरे 36 दिन बैठता है।

अब ज़रा कल्पना कीजिए, हमारी ज़िंदगी का एक पूरा महीना सिर्फ स्क्रीन पर अंगूठा खिसकाने में स्वाहा हो रहा है। और डरावनी बात तो यह है कि इसमें वह समय शामिल ही नहीं है जो हम काम, पढ़ाई या परिवार के बीच बार-बार नोटिफिकेशन चेक करने में लगाते हैं।

सोशल मीडिया के बारे में एक दिलचस्प बात यह भी है कि इस पर बिताया जाने वाला ज़्यादातर समय हम पहले से तय नहीं करते। अक्सर इसकी शुरुआत महज़ 5 मिनट के ब्रेक से होती है, लेकिन ये 5 मिनट कब 2 घंटे में बदल जाते हैं, पता ही नहीं चलता।

इस डिजिटल जाल में सिर्फ आम लोग नहीं फंसे हैं, बल्कि दुनिया के सबसे व्यस्त और मशहूर लोग भी इसके शिकार हैं और वे इस बारे में खुलकर बात भी कर चुके हैं।

पॉप स्टार सेलेना गोमेज़ सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा फॉलो की जाने वाली हस्तियों में से एक हैं। उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में बताया था कि हर पल फोन में घुसे रहने की वजह से वह डिप्रेशन और भारी तनाव महसूस करने लगी थीं। इसके बाद उन्होंने अपने फोन से सारे सोशल मीडिया ऐप्स हटा दिए और अपने अकाउंट्स का ज़िम्मा अपनी टीम को सौंप दिया।

पिछले ही दिनों बॉलीवुड अभिनेत्री कृति सेनन ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को दिए एक इंटरव्यू में रील्स की लत और उससे होने वाली मानसिक थकान के बारे में बात की थी। उन्होंने बताया कि वे स्किनकेयर रील्स देखने की शौकीन हैं और कई बार स्क्रीन स्क्रॉल करते हुए उनके दो घंटे कैसे बीत जाते हैं, उन्हें खुद पता नहीं चलता।

कुछ साल पहले अभिनेता आमिर खान ने भी डिजिटल भटकाव और इससे बर्बाद होने वाले समय पर चिंता जताते हुए अपना अकाउंट बंद कर दिया था।

कई हस्तियों ने इस बात को स्वीकारा है कि कैसे घंटों फोन स्क्रॉलिंग के बाद सुकून नहीं, बल्कि एक अजीब सी मानसिक थकान और खालीपन महसूस होता है।

ऐसे में एक बड़ा सवाल यह उठता है कि जब हम सोशल मीडिया पर अपना समय पहले से तय नहीं करते, तो आखिर वह क्या चीज़ है जो हमें इससे बांधे रखती है?

हम में से ज़्यादातर लोग स्क्रीन टाइम के नुकसानों से वाकिफ हैं, मगर फिर भी हमारे कई घंटे फोन स्क्रॉल करने में गुज़र जाते हैं। क्या इसके पीछे हमारी कमज़ोर इच्छाशक्ति है? या शायद सबसे बड़ी वजह ट्रिलियन-डॉलर टेक कंपनियों का वो खतरनाक डिज़ाइन है, जिसे हम ‘इन्फिनिटी स्क्रॉल’ (Infinite Scroll) कहते हैं।

गूगल के पूर्व प्रोडक्ट मैनेजर ट्रिस्टन हैरिस और मोज़िला के पूर्व इंजीनियर अज़ा रस्किन जैसे टेक विशेषज्ञ खुद मान चुके हैं कि सिलिकॉन वैली जानबूझकर हमारे दिमाग के साथ खेल रही है। इन ऐप्स का डिज़ाइन ऐसा है, मानो आपकी स्क्रीन पर किसी ने व्यवहार को उकसाने वाली कोकीन (Behavioral Cocaine) छिड़क दी हो, जो आपको बार-बार ऐप खोलने पर मजबूर करती है।

ज़रा सोचिए, जब हम अखबार या किताब पढ़ते हैं, तो पेज खत्म होने पर दिमाग को एक प्राकृतिक ठहराव मिलता है। मनोविज्ञान में इसे ‘स्टॉपिंग क्यू’  यानी रुकने का संकेत कहते हैं। एक पन्ना खत्म होता है, तो दिमाग एक सेकंड के लिए सोचता है कि आगे पढ़ना है या किताब बंद करनी है।

शुरुआती दिनों में इंटरनेट पर भी नीचे ‘अगला पेज’ लिखा आता था, जिस पर क्लिक करना होता था। लेकिन इन्फिनिटी स्क्रॉल ने इस रुकने के संकेत को ही खत्म कर दिया। इसके कारण यूज़र को पता ही नहीं चलता कि अब उसे रुकना है, और इसी अबाध प्रवाह में घंटों गुज़र जाते हैं।

इन्फिनिटी स्क्रॉल का जनक अज़ रस्किन को माना जाता है। उन्होंने 2006 में इसे इसलिए बनाया था ताकि लोगों को बार-बार अगले पेज पर क्लिक करने की झंझट न हो और उनका समय बच सके। लेकिन आज उन्हें अपने ही इस आविष्कार पर गहरा अफसोस है। उन्होंने दुःख जताते हुए कहा है कि जिस तकनीक को उन्होंने लोगों का समय बचाने के लिए बनाया था, आज उसी तकनीक के कारण हर महीने पूरी दुनिया में इंसानों की लगभग 5 लाख ज़िंदगियों के बराबर का समय सिर्फ स्क्रीन स्क्रॉल करने में बर्बाद हो जाता है।

इन्फिनिटी स्क्रॉल कैसे हमें ज़रूरत से ज़्यादा कंटेंट परोस देता है, इसे कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के मशहूर ‘बॉटमलेस बाउल’ प्रयोग से आसानी से समझा जा सकता है।

2005 में हुए इस मनोवैज्ञानिक प्रयोग में लोगों को दो समूहों में बांटा गया और उन्हें सूप परोसा गया। एक समूह को सामान्य कटोरा दिया गया, जबकि दूसरे समूह को एक ऐसा कटोरा दिया गया जिसके नीचे एक छिपी हुई नली थी जो कटोरे को चुपचाप भरती रहती थी। बिना पेंदी के उस कटोरे वाले लोगों ने सामान्य से 73 फीसदी ज़्यादा सूप पी लिया, क्योंकि उन्हें अपना बर्तन कभी खाली दिखा ही नहीं। आज हमारा फोन भी वही जादुई कटोरा बन गया है। कंटेंट कभी खत्म नहीं होता, इसलिए हम कभी रुकते नहीं।

बाद में सोशल मीडिया कंपनियों ने इसमें कैसीनो की ‘स्लॉट मशीन’ का फॉर्मूला भी जोड़ दिया। जब हम नया वीडियो देखने के लिए स्क्रीन को नीचे खींचते हैं, तो एक पल की अनिश्चितता होती है कि अब क्या नया आएगा। यही सस्पेंस हमारे दिमाग में डोपामाइन  पैदा करता है, और हम अगली अच्छी चीज़ की तलाश में अंगूठा खिसकाते रहते हैं।

धीरे-धीरे सोशल मीडिया का वह पुराना रूप भी खत्म हो गया जहाँ हम अपने दोस्तों या परिवार से जुड़ते थे। अब यह महज़ एक ‘रिकॉमेंडेशन एंटरटेनमेंट नेटवर्क’ बन चुका है। एल्गोरिदम हमें अपनों की पोस्ट नहीं दिखाता, बल्कि ऐसा कंटेंट परोसता है जो बस किसी भी तरह हमारी आंखों को स्क्रीन से बांधे रखे।

यह सिर्फ हमारे समय की बर्बादी नहीं है, यह सीधे तौर पर हमारी सोचने-समझने की क्षमता पर हमला है।

शोध बताते हैं कि लगातार स्क्रॉल करते समय इंसान एक तरह के सम्मोहन या ज़ॉम्बी मोड (Dissociative State) में चला जाता है, जहाँ उसे अपने आस-पास और समय के गुज़रने का अहसास ही नहीं होता। कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च इस खतरे की गहराई को और स्पष्ट करती है।

रिसर्च के मुताबिक, अगर आप काम के बीच सिर्फ एक मिनट के लिए भी फोन चेक कर लेते हैं, तो आपके दिमाग को वापस अपने पुराने गहरे ध्यान में लौटने में तेईस मिनट से भी ज़्यादा का समय लग जाता है। हमारी एकाग्रता हर रोज़ इसी तरह टुकड़ों में टूट रही है।

अब एक पल के लिए ठहरकर खुद से एक सवाल पूछिए—क्या हम सच में इतने बेबस हो चुके हैं कि कुछ टेक कंपनियों के बनाए एल्गोरिदम हमारी ज़िंदगी के कीमती घंटों का फैसला करें?

यही वजह है कि आज दुनिया भर में इस डिजिटल सम्मोहन के खिलाफ एक बेचैनी दिख रही है। फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश अब स्कूलों में फोन बैन करने और बच्चों के लिए उम्र सीमा तय करने के कानून ला रहे हैं।

व्यक्तिगत स्तर पर भी हमें कुछ कदम उठाने होंगे। डिजिटल डिटॉक्स अब कोई शौक नहीं, बल्कि हमारी मानसिक शांति के लिए एक मजबूरी बन गया है।

न्यूरोसाइंटिस्ट्स सलाह देते हैं कि अपने फोन की डिस्प्ले को ब्लैक एंड व्हाइट (Grayscale) कर दें। जैसे ही स्क्रीन से रंग गायब होते हैं, दिमाग के लिए उस कंटेंट का नशा आधा रह जाता है।

इसके अलावा कुछ ऐसे ऐप्स भी मौजूद हैं जो किसी भी सोशल मीडिया ऐप को खोलने से पहले महज़ 5 सेकंड का ठहराव देते हैं। वह 5 सेकंड का ब्रेक आपके दिमाग के सम्मोहन को तोड़ने के लिए काफी होता है।

Fahad Hayat

Fahad Hayat

Fahad Hayat is a Editor at The Focus live. He likes to write on Sports and Politics. 6 Year Experience in Print & Digital Media.

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