रात के 2 बजे का वक्त, कमरे में अंधेरा और मोबाइल की स्क्रीन से चेहरे पर पड़ती तेज रोशनी… आज लगभग हर दूसरे घर में बच्चों और किशोरों का यही हाल है। आधी-आधी रात तक जागकर सोशल मीडिया स्क्रॉल करने की इस लत (Digital Addiction) ने बच्चों की नींद, पढ़ाई और दिमागी सेहत को बुरी तरह प्रभावित किया है। लेकिन अब फेसबुक और इंस्टाग्राम चलाने वाली कंपनी मेटा को इस पर लगाम लगानी ही पड़ेगी।
अमेरिका में बच्चों की सुरक्षा से जुड़े एक बहुत बड़े कानूनी मामले को खत्म करने के लिए मेटा ने एक ऐतिहासिक समझौता किया है। इस समझौते के तहत कंपनी को करीब 17 से 18 अरब डॉलर (लगभग 1.6 लाख करोड़ रुपये) का भारी-भरकम भुगतान करना होगा।
आखिर क्या था यह पूरा विवाद?
2023 में अमेरिका के 40 से ज्यादा राज्यों के अटॉर्नी जनरल ने मेटा पर कोर्ट में केस दर्ज कराया था। आरोप सीधा और गंभीर थामेटा ने जानबूझकर फेसबुक और इंस्टाग्राम में ऐसे फीचर्स (जैसे अनलिमिटेड स्क्रॉलिंग, लाइक काउंट्स) बनाए, जो बच्चों को इन ऐप्स का लती बना दें।
अदालत में मामले की सुनवाई के दौरान मेटा के ही एक पूर्व सिक्योरिटी इंजीनियर आर्टुरो बेजार की गवाही ने कंपनी की पोल खोल दी। उन्होंने कोर्ट को बताया कि मेटा का अंदरूनी कल्चर बच्चों की सुरक्षा और भलाई से ज्यादा ‘कंपनी की ग्रोथ और एंगेजमेंट’ को तरजीह देता था। कंपनी को पता था कि उसके प्रोडक्ट्स से बच्चों को मानसिक और शारीरिक नुकसान हो रहा है, फिर भी वह माता-पिता और जनता को गुमराह करती रही।
18 साल से कम उम्र वालों के लिए अब क्या-क्या बदल जाएगा?
इस कानूनी समझौते के बाद 18 साल से कम उम्र के टीनएजर्स के लिए इंस्टाग्राम और फेसबुक चलाने के नियम पूरी तरह बदलने वाले हैं. इसके अनुसार रात 12 बजे से लेकर सुबह 6 बजे तक किशोर फेसबुक और इंस्टाग्राम का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे। दोनों ऐप्स को मिलाकर दिन भर में कुल 2 घंटे की ही डिफॉल्ट लिमिट मिलेगी। इसे हटाने के लिए माता-पिता की औपचारिक इजाजत अनिवार्य होगी। सुबह 8 बजे से दोपहर 3 बजे तक (स्कूल के समय) नोटिफिकेशन म्यूट रहेंगे, ताकि पढ़ाई में खलल न पड़े। (सिर्फ जरूरी मैसेज और सेफ्टी अलर्ट ही आएंगे)। बच्चों के पोस्ट से सार्वजनिक ‘लाइक काउंट’ हटा दिया जाएगा ताकि वे ज्यादा से ज्यादा लाइक्स पाने के तनाव से बच सकें। साथ ही कॉस्मेटिक-सर्जरी वाले ब्यूटी फिल्टर्स पर भी बैन लगेगा।
यूट्यूब और टिकटॉक पर भी फंसा पेच
मेटा ने अदालत में अपनी गलती तो स्वीकार नहीं की है, लेकिन उसने एक दिलचस्प शर्त जरूर रखी है। मेटा का कहना है कि सिर्फ उसके ऐप्स पर सख्ती करने से बच्चे सुधरेंगे नहीं, वे यूट्यूब और टिकटॉक पर शिफ्ट हो जाएंगे। इसलिए समझौते की कुल रकम का एक बड़ा हिस्सा (लगभग 5 अरब डॉलर) इस बात पर निर्भर करेगा कि यूट्यूब और टिकटॉक भी बच्चों के लिए 1 घंटे की डेली लिमिट और नाइट-बैन जैसे सख्त नियम लागू करते हैं या नहीं।
भारत पर इसका क्या असर होगा?
हालांकि, यह कानूनी समझौता मुख्य रूप से अमेरिका में हुआ है और भारत में इसका सीधा कानूनी असर नहीं होगा। लेकिन जिस तरह से भारत में भी बच्चों का स्क्रीन टाइम एक बड़ी सामाजिक समस्या बन चुका है, टेक कंपनियों पर ग्लोबल लेवल पर बन रहा यह दबाव भारतीय यूजर्स के लिए भी फायदेमंद साबित हो सकता है। उम्मीद है कि आने वाले समय में मेटा ये सेफ्टी फीचर्स भारतीय टीनएजर्स के लिए भी रोलआउट करेगा।






