Opinion

पर्दा हटा, भेद खुला: सोशल मीडिया और ब्यूटी फिल्टर की कड़वी हकीकत

जुलाई 2019, चीन में ऐसा मामला सामने आया जिसने डिजिटल दुनिया की चमक के पीछे छिपी एक असहज सच्चाई को सामने ला दिया था। एक मशहूर वीडियो ब्लॉगर, जो खुद को “योर हाइनेस कियाओ बिलुओ” कहती थीं, के फैन्स उस तब हैरान रह गए जब एक लाइव-स्ट्रीम के दौरान हुई तकनीकी गड़बड़ी की वजह से उनका चेहरा अचानक बदल गया। जिस युवा और आकर्षक लड़की को उनके दर्शक लंबे समय से स्क्रीन पर देखते आए थे, अचानक उसकी जगह कैमरे पर एक अधेड़ उम्र की महिला दिखाई देने लगी।

ऐसे ही मामले से जुड़ी एक एक चार सेकेंड की क्लिप पिछले ही दिनों सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुई, जिसमें लाइव स्ट्रीमिंग के दौरान इंफ्लूएंसर के चेहरे से ब्यूटी फिल्टर हट गया और उसका वास्तविक चेहरा सामने आ गया। इस पोस्ट में दावा किया गया था कि इस घटना के बाद उनके 1.40 लाख से अधिक फॉलोअर्स कम हो गए।

हालांकि इस घटना में इंफ्लूएंसर की पहचान और फॉलोअर की संख्या की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन कुछ सेकंड की इस तकनीकी गड़बड़ी ने सोशल मीडिया की उस दुनिया पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया, जहां चेहरा सिर्फ चेहरा नहीं है, बल्कि एक डिजिटल पहचान बन चुका है। हम स्क्रीन पर जिस व्यक्ति को देखते हैं, क्या वह वास्तव में वैसा ही है, या फिर हम उस चेहरे को देख रहे हैं जिसे किसी एल्गोरिदम ने हमारे लिए थोड़ा और सुंदर बना दिया है?

बीते सालों में इस तरह के कई और मामले सामने आए हैं। लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि कोई व्यक्ति अपनी उम्र कम दिखाना चाहता है या चेहरे की कुछ कमियां छिपाना चाहता है। इंसान सदियों से ऐसा करता आया है। लेकिन असली सवाल तब शुरू होता है, जब फिल्टर से बना चेहरा हमें अपने वास्तविक चेहरे से बेहतर लगने लगे और धीरे-धीरे वही चेहरा हमारी सुंदरता का नया पैमाना बन जाए।

आज ब्यूटी फिल्टर केवल सेल्फी को सुंदर बनाने का माध्यम नहीं हैं। वे विज्ञापन और डिजिटल कारोबार का भी हिस्सा बन चुके हैं। कई इंफ्लूएंसर स्किनकेयर और कॉस्मेटिक उत्पादों का प्रचार करते हुए ऐसी तस्वीरें और वीडियो इस्तेमाल करते हैं, जिनमें त्वचा बेहद साफ, चमकदार और लगभग बेदाग दिखाई देती है। दर्शक को लगता है कि सामने वाले की यह त्वचा किसी खास क्रीम, सीरम या ट्रीटमेंट का नतीजा है, जबकि तस्वीर में इस्तेमाल किया गया फिल्टर त्वचा की वास्तविक बनावट को पहले ही बदल चुका होता है। यहीं से मामला सिर्फ खूबसूरती का नहीं, भरोसे का हो जाता है।

कोई व्यक्ति जब हजारों रुपये खर्च करके किसी प्रोडक्ट को इसलिए खरीदता है क्योंकि उसने स्क्रीन पर किसी इंफ्लूएंसर की बेदाग त्वचा देखी है, तो वह वास्तव में उस चेहरे की सच्चाई पर भरोसा कर रहा होता है। अगर वह चेहरा डिजिटल रूप से बदला हुआ है, तो उपभोक्ता को एक ऐसी चीज दिखाई जा रही है जो वास्तविक नहीं है।

आज की डिजिटल अर्थव्यवस्था में सुंदरता सिर्फ दिखाई नहीं जाती, बेची भी जाती है। पहले विज्ञापन हमें बताते थे कि कौन-सा साबुन त्वचा को बेहतर बनाएगा या कौन-सी क्रीम चेहरे पर चमक लाएगी। अब सोशल मीडिया पर एक इंफ्लूएंसर खुद उस ‘परफेक्ट चेहरे’ का उदाहरण बन जाता है, जिसे देखकर लाखों लोग अपने चेहरे को उसके जैसा बनाने की कोशिश करते हैं।

ब्यूटी फिल्टर के बढ़ते इस्तेमाल और उनके असर को लेकर कई देशों में नियमों पर बहस शुरू हुई है। फ्रांस ने व्यावसायिक तस्वीरों में डिजिटल बदलाव को लेकर ऐसे नियम बनाए हैं जिनका उद्देश्य उपभोक्ताओं को यह बताना है कि किसी तस्वीर को बदला गया है या नहीं। नॉर्वे ने भी 2021 में सोशल मीडिया और विज्ञापन से जुड़े डिजिटल रूप से बदले गए चित्रों को लेकर नियम लागू किए थे।

इन नियमों के पीछे एक साधारण लेकिन महत्वपूर्ण विचार है- अगर किसी तस्वीर में चेहरे या शरीर को डिजिटल तरीके से बदला गया है और उस तस्वीर का इस्तेमाल किसी व्यावसायिक उद्देश्य के लिए किया जा रहा है, तो दर्शक को इसकी जानकारी होनी चाहिए।

यह चिंता सिर्फ विज्ञापन तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा प्रभाव उन लोगों पर पड़ सकता है जो अभी अपनी पहचान और अपने शरीर को लेकर एक निश्चित समझ विकसित कर रहे हैं। किशोर उम्र में जब कोई व्यक्ति रोज ऐसे चेहरे देखता है जिनकी त्वचा बिना किसी दाग के है, नाक एक खास आकार की है, आंखें बड़ी हैं और चेहरा एक तय सौंदर्य मानक के अनुरूप दिखाई देता है, तो वह अनजाने में अपने चेहरे की तुलना उसी स्क्रीन से करने लगता है।

‘स्नैपचैट डिस्मॉर्फिया’ कोई आधिकारिक चिकित्सीय बीमारी नहीं है, लेकिन यह शब्द उस स्थिति को समझाने के लिए लोकप्रिय हुआ जिसमें लोग अपनी फिल्टर की हुई तस्वीर को अपने वास्तविक चेहरे से बेहतर मानने लगते हैं। कुछ लोग कॉस्मेटिक सर्जरी या दूसरे सौंदर्य उपचारों के लिए डॉक्टर के पास किसी अभिनेत्री या मॉडल की तस्वीर लेकर जाने के बजाय अपनी ही फिल्टर वाली सेल्फी लेकर पहुंचने लगे हैं।

पहले सुंदरता का आदर्श हमारे बाहर था। कोई फिल्म स्टार, मॉडल या सेलिब्रिटी हमारे लिए खूबसूरती का पैमाना बनता था। अब वह पैमाना हमारे अपने फोन के कैमरे में मौजूद है। हम अपनी तस्वीर लेते हैं, चेहरे को थोड़ा पतला करते हैं, त्वचा को चिकना करते हैं, आंखों का आकार बदलते हैं और फिर स्क्रीन पर दिखाई देने वाले चेहरे को देखकर खुद को बेहतर महसूस करते हैं।

धीरे-धीरे यह बदलाव सिर्फ तस्वीर तक सीमित नहीं रहता। कुछ लोगों के लिए वही डिजिटल चेहरा उनकी वास्तविक पहचान का आदर्श बनने लगता है। यहीं से आईना और स्क्रीन एक-दूसरे के सामने खड़े हो जाते हैं। एक तरफ वह चेहरा है जो वास्तव में हमारे पास है और दूसरी तरफ वह चेहरा है जिसे हम चाहते हैं कि दुनिया देखे। समस्या तब पैदा होती है जब हमें अपना वास्तविक चेहरा उस डिजिटल चेहरे की तुलना में कम सुंदर दिखाई देने लगता है।

खुद को वास्तविकता से बेहतर दिखाने की इच्छा सोशल मीडिया के साथ पैदा नहीं हुई। इंसान ने हमेशा अपने चेहरे और शरीर को अपनी पसंद के अनुसार बदलने की कोशिश की है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले इसके लिए आईना, मेकअप, पाउडर या रसायनों की जरूरत होती थी और आज वही काम एक छोटे से डिजिटल फिल्टर से हो जाता है।

सोलहवीं सदी के यूरोप में बेहद गोरी त्वचा को सुंदरता और सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़ा जाता था। इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम के दौर में ‘वेनेटियन सेरूस’ नाम का एक सफेद कॉस्मेटिक इस्तेमाल किया जाता था, जिसमें सीसा शामिल था। यह चेहरे को बेहद सफेद और ग्लोइंग दिखाता था, लेकिन लंबे समय तक इस्तेमाल स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता था।

बाद के दौर में यूरोप में ‘मौश’ या Beauty Patches का चलन भी लोकप्रिय हुआ। चेहरे पर छोटे-छोटे कपड़े के टुकड़े लगाए जाते थे। शुरुआत में इनका इस्तेमाल चेचक के निशान छिपाने के लिए किया जाता था, लेकिन धीरे-धीरे ये फैशन का हिस्सा बन गए। कोई चांद के आकार का पैच लगाता था, कोई सितारे का और कोई दिल के आकार का। उस समय चेहरे के दाग को छिपाने के लिए एक छोटा-सा कपड़ा लगाया जाता था। आज वही काम एक डिजिटल एल्गोरिदम करता है। साधन बदल गया है, लेकिन इच्छा बहुत पुरानी है- दूसरों की नजर में थोड़ा और सुंदर दिखाई देने की इच्छा।

स्मार्टफोन कैमरों और सोशल मीडिया के विकास के साथ चेहरे को वास्तविक समय में बदलने वाली तकनीक तेजी से लोकप्रिय हुई। Snapchat के Lenses ने 2015 के आसपास इस अनुभव को आम लोगों तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई। शुरुआत में यह मनोरंजन था। लोग अपने चेहरे पर अलग-अलग इफेक्ट लगाते थे, जानवरों के कान बनाते थे या खुद को किसी मजेदार किरदार में बदल लेते थे।

लेकिन धीरे-धीरे फिल्टर ने मनोरंजन से आगे बढ़कर चेहरे की एक नई परिभाषा बनानी शुरू कर दी। बड़ी आंखें, पतली नाक, उभरे हुए होंठ, चिकनी त्वचा और एक ऐसा चेहरा जिसमें प्राकृतिक असमानताओं के लिए बहुत कम जगह हो—इन सबने मिलकर डिजिटल सुंदरता का एक नया चेहरा तैयार किया।

इंस्टाग्राम, स्नैपचैट और डौयून जैसे प्लेटफॉर्मों ने इस बदलाव को और तेज किया। अब फिल्टर सिर्फ तस्वीर पर लगाया जाने वाला कोई छोटा-सा इफेक्ट नहीं है। वह डिजिटल पहचान का हिस्सा बन गया है। हम जिस चेहरे को अपनी प्रोफाइल तस्वीर बनाते हैं, जिस चेहरे के साथ वीडियो पोस्ट करते हैं और जिस चेहरे को हजारों लोग लाइक करते हैं, वह कई बार हमारे वास्तविक चेहरे से अलग होता है।

सदियों पहले इंसान चेहरे के दाग छिपाने के लिए रसायनों और कपड़ों का सहारा लेता था। फिर मेकअप आया, उसके बाद फोटो एडिटिंग और अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से चलने वाले फिल्टर हमारे चेहरे को कुछ ही सेकंड में बदल देते हैं। तकनीक लगातार बेहतर होती गई, लेकिन उसके साथ हमारी उम्मीदें भी बदलती गईं।

आज हम अपने चेहरे को जिस आसानी से बदल सकते हैं, शायद इतिहास में कभी नहीं बदल पाए थे। हम त्वचा साफ कर सकते हैं, चेहरे का आकार बदल सकते हैं, आंखें बड़ी कर सकते हैं और ऐसी तस्वीर बना सकते हैं जिसे देखकर हमें खुद भी लगे कि यही हमारा सबसे अच्छा रूप है।

लेकिन इसी सुविधा के भीतर एक सवाल छिपा है—अगर हमें रोज अपना बदला हुआ चेहरा पसंद आने लगे, तो क्या एक दिन हमारा वास्तविक चेहरा हमें ही कम अच्छा लगने लगेगा? क्या हम धीरे-धीरे ऐसे समाज की तरफ बढ़ रहे हैं जहां पिक्सल्स की परफेक्शन को वास्तविकता से ज्यादा महत्व मिलने लगेगा?

और अगर किसी फिल्टर की छोटी-सी तकनीकी गड़बड़ी कुछ ही सेकंड में उस चेहरे को दुनिया के सामने ला सकती है जिसे हम छिपाना चाहते हैं, तो हमारी डिजिटल पहचान आखिर कितनी वास्तविक है? शायद समस्या फिल्टर के होने में नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब फिल्टर हमारे लिए यह तय करने लगे कि खूबसूरत दिखने का मतलब क्या है।क्योंकि तकनीक चेहरे को बदल सकती है, लेकिन यह तय करने की जिम्मेदारी अभी भी हमारी है कि हम किस चेहरे को अपना मानते हैं।

Fahad Hayat

Fahad Hayat

Fahad Hayat is a Editor at The Focus live. He likes to write on Sports and Politics. 6 Year Experience in Print & Digital Media.

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