2 नवंबर की आधी रात होते ही बांद्रा में मन्नत के सामने वही जाना-पहचाना मंज़र होता है हज़ारों लोग, मोबाइल की रोशनियां और एक ही नाम की गूंज। शाहरुख़ ख़ान 61 साल के हो गए हैं।
आज उन्हें ‘रोमांस किंग’ कहना इतना आम है कि हम भूल ही जाते हैं इस ताज की शुरुआत किसी प्रेम कहानी से नहीं, विलेन के रोल, एक पागल आशिक़ और एक ऐसे किरदार से हुई थी, जिसे करने से उस दौर के हर बड़े सितारे ने इनकार कर दिया था।
वो रोल, जिसे सबने ठुकराया
1993 की ‘बाज़ीगर’ की कहानी अब्बास-मस्तान पहले आमिर ख़ान के पास ले गए थे उन्हें किरदार से जुड़ाव नहीं हुआ। सलमान ख़ान को स्क्रिप्ट पसंद आई, मगर पिता सलीम ख़ान की सलाह थी कि इतने नकारात्मक किरदार में मां का भावुक एंगल जोड़ा जाए, वरना दर्शक नायक से जुड़ नहीं पाएंगे। निर्देशक नहीं माने, सलमान अलग हो गए। अनिल कपूर ने भी कहा कि रोल ज़रूरत से ज़्यादा नकारात्मक है। तब यह फिल्म उस लड़के के पास गई, जो अभी टीवी से आया ही था।
शाहरुख़ ने न सिर्फ़ हां कहा, बल्कि एक अजीब शर्त रखी किरदार की नकारात्मकता को नरम बिल्कुल नहीं किया जाएगा। यह बात बाद में खुद अब्बास-मस्तान ने बताई थी। वितरक यह सोचकर घबराए हुए थे कि नायक अपनी ही प्रेमिका को छत से धकेलकर मार डाले, यह दर्शक कैसे हज़म करेंगे? मगर शाहरुख़ अड़े रहे।
नतीजा यह हुआ कि जिस विलेन के किरदार को निभाने के लिए कोई तैयार नहीं था, उसी भूमिका के लिए शाहरुख़ को फिल्मफ़ेयर का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार मिला। दिलचस्प यह भी है कि मां वाला एंगल बाद में फिल्म में जुड़ा ही राखी गुलज़ार उस किरदार में आईं, जिसकी सलाह पर सलमान अलग हुए थे।
‘क-क-क-किरण’ के पीछे की कहानी
उसी साल के अंत में आई यश चोपड़ा की ‘डर’। कम लोग जानते हैं कि यश चोपड़ा ने शाहरुख़ को रोल देते समय पूरी ईमानदारी से कहा था कि “मैं किसी और को चाहता था, मगर वे यह रोल करने को तैयार नहीं हैं। मुझे लगता है यह बहुत अच्छा रोल है, तुम्हें करना चाहिए।” शाहरुख़ को यही साफ़गोई पसंद आई। सबको ‘अच्छे लड़के’ वाले रोल मिल रहे थे, वे बुरे बनना चाहते थे।
फिल्म का सबसे मशहूर संवाद ‘आई लव यू, क-क-क-किरण’ किसी लेखक की कलम से नहीं, शाहरुख़ की अपनी तैयारी से निकला था। नेटफ्लिक्स की डॉक्यूसीरीज़ ‘द रोमांटिंक्स’ में उन्होंने बताया था कि उनके एक सहपाठी को हकलाहट थी।
फिर एक बीबीसी डॉक्यूमेंट्री से उन्हें समझ आया कि हकलाने वाले का दिमाग किसी एक आवाज़ के प्रति इतना सजग हो जाता है कि शब्द वहीं अटक जाता है। उन्होंने यश चोपड़ा से इसे किरदार में इस्तेमाल करने की बात कही। तब सहायक निर्देशक आदित्य चोपड़ा ने सुझाव दिया अगर दिमाग किसी एक चीज़ के प्रति सजग होता है, तो राहुल को सबसे सजग उसी के नाम से होना चाहिए, जिससे वह सबसे ज़्यादा मोहब्बत करता है। इसीलिए राहुल पूरी फिल्म में सिर्फ़ ‘किरण’ कहते हुए हकलाता है।
जब खलनायाक के लिए मिला अवार्ड
1994 में ‘अंजाम’ आई। माधुरी दीक्षित के सामने दीवाना आशिक़ विजय अग्निहोत्री और शाहरुख़ को मिला सर्वश्रेष्ठ खलनायक का फिल्मफ़ेयर पुरस्कार। तीन साल में वे हिंदी सिनेमा के सबसे डरावने प्रेमी बन चुके थे।
मगर इन्हीं सालों में एक छोटी-सी फिल्म वह पुल बन गई, जिस पर चलकर खलनायक रोमांस तक पहुंचा कुंदन शाह की ‘कभी हां कभी ना’। इसमें शाहरुख़ का सुनील न खलनायक था, न हीरो वह बस एक हारने वाला आशिक़ था, जो अपनी मोहब्बत को अपने ही दोस्त के लिए छोड़ देता है। शाहरुख़ आज भी इसे अपनी सबसे पसंदीदा फिल्म कहते हैं। कम सुना किस्सा यह है कि इस पूरी फिल्म के लिए उन्हें सिर्फ़ 25,000 रुपये मिले थे, और रिलीज़ के दिन वे खुद मुंबई के एक थिएटर की टिकट खिड़की पर बैठकर टिकट बेचते रहे।
वो सलाह जिसने बदली किस्मत
मोड़ आया ‘डर’ के ही सेट से। आदित्य चोपड़ा ने वहां शाहरुख़ को करीब से देखा था। बाद में वे कहते थे कि “तुम्हारी आंखों में कुछ है, जो सिर्फ़ एक्शन में बर्बाद नहीं होना चाहिए।” जब आदित्य अपनी पहली फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ की कहानी सुनाने आए, तो शाहरुख़ सन्न रह गए। उन्होंने बाद में हंसते हुए बताया था कि उन्हें लगा यह कैसी मीठी-सी फिल्म है, जिसमें लड़का लड़की को भगाकर तक नहीं ले जाता!
आदित्य ने हार नहीं मानी। उन्होंने शाहरुख़ को एक सलाह दी, जो बाद में फॉर्मूला साबित हुई कि “प्रेम कहानियों के दरवाज़े अपने लिए कभी बंद मत करना। इस देश में सुपरस्टार वही बनता है, जो हर मां का बेटा, हर बहन का भाई और हर कॉलेज लड़की का सपना हो।”
20 अक्टूबर 1995 को डीडीएलजे रिलीज़ हुई और भारतीय सिनेमा की सबसे लंबी चलने वाली फिल्म बन गई। इसके बाद ‘दिल तो पागल है’, ‘कुछ कुछ होता है’, ‘मोहब्बतें’, ‘देवदास’, ‘कल हो ना हो’ और ‘वीर-ज़ारा’ ने वह साम्राज्य खड़ा किया, जिसे आज ‘रोमांस किंग’ कहा जाता है। बाहें फैलाकर खड़ा राज, हिंदी सिनेमा के प्रेम का सबसे पहचाना जाने वाला चित्र बन गया।
खुद की प्रेम कहानी भी किसी फिल्म से कम नहीं
असली सवाल यह नहीं है कि खलनायक रोमांस किंग कैसे बना। असली सवाल यह है कि वही आंखें, जो ‘डर’ में जुनून से डराती थीं, डीडीएलजे में भरोसा कैसे जगाने लगीं? शायद इसलिए, क्योंकि शाहरुख़ का अपना प्रेम किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं रहा गौरी से उनकी शादी (1991) शोहरत से पहले की है, संघर्ष के दिनों की है। और शायद इसलिए भी, क्योंकि राज ने प्रेम को जीतना नहीं, इज़्ज़त करना सिखाया वह लड़की को भगाता नहीं, उसके पिता से हाथ मांगने आता है।
जिस अभिनेता ने प्रेम को ज़िद और जुनून से शुरू किया था, उसी ने उसे धैर्य और मर्यादा तक पहुंचाया। इसमें उनकी अपनी प्रेम कहानी की झलक भी है, जो उन्होंने खुद कई बार सुनाई है दिल्ली की एक पार्टी में गौरी से मुलाकात, फिर जब गौरी दोस्तों के साथ मुंबई घूमने चली गईं, तो नौजवान शाहरुख़ पीछे-पीछे मुंबई पहुंच गए और समंदर किनारे उन्हें ढूंढते रहे, क्योंकि उन्हें बस इतना पता था कि गौरी को तैरना बहुत पसंद है।
पर्दे का सबसे दीवाना आशिक़ असल ज़िंदगी में भी अपनी मोहब्बत के पीछे शहर बदल चुका था फर्क सिर्फ़ इतना है कि असली कहानी में वह दीवानगी इज़्ज़त में बदल गई।