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ग़ुस्सा, सादगी और कारगिल की बर्फ़: नाना पाटेकर की असली ज़िंदगी की वो भूमिकाएं जो कैमरे के पार थीं

पर्दे पर अपने डायलॉग डिलीवरी, बेबाक शैली और तीखे ग़ुस्सा के लिए पहचाने जाने वाले नाना पाटेकर की असली ज़िंदगी भी किसी सिनेमाई पटकथा से कम नहीं रही है।

बॉलीवुड के मशहूर अदाकार नाना पाटेकर का गुरुवार सुबह 75 साल की उम्र में निधन हो गया। गोवा स्थित घर में कार्डियक अरेस्ट के बाद उन्हें करीब 45 मिनट तक CPR दी गई, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका।  गुरुवार रात पुणे के डोंजे स्थित उनके फार्महाउस पर राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार हुआ।

पर्दे पर अपने डायलॉग डिलीवरी, बेबाक शैली और तीखे ग़ुस्सा के लिए पहचाने जाने वाले नाना पाटेकर की असली ज़िंदगी भी किसी सिनेमाई पटकथा से कम नहीं रही है। कहानी मुंबई की उन सड़कों से शुरू होती है, जहाँ एक लड़का सफ़ेद पट्टियाँ रंगता था।

35 रुपये की नौकरी और ज़ेबरा क्रॉसिंग रंगने का दौर

कम लोग ही जानते हैं कि उनका पूरा नाम विश्वनाथ गजानन पाटेकर था। नाना पाटेकर का शुरुआती बचपन ठीक-ठाक बीता। उनके पिता का अपना कारोबार था और परिवार में सब कुछ ठीक चल रहा था। लेकिन नियति ने अचानक करवट ली जब पिता के साझेदार ने धोखा देकर पूरा व्यापार अपने नाम कर लिया। रातों-रात परिवार पर गहरा आर्थिक संकट आ पड़ा।

माहौल को संभालते हुए मात्र तेरह वर्ष की उम्र में नाना ने काम की तलाश शुरू कर दी। उन दिनों वह मुंबई के चुनाभट्टी इलाके में फ़िल्मों के पोस्टर रंगने का काम करते थे। रोज़ आठ किलोमीटर पैदल चलकर जाना और दिन-भर मेहनत करने के बाद महीने के सिर्फ़ 35 रुपये मिलना-यह उनकी पहली कमाई थी।

इसी दौरान जेब खर्च और घर की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए उन्होंने सड़कों पर ज़ेबरा क्रॉसिंग पेंट करने का काम भी किया, जिसके लिए उन्हें 15 रुपये मिला करते थे। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने पढ़ाई नहीं छोड़ी और बाद में मुंबई के प्रसिद्ध ‘सर जे.जे. इंस्टीट्यूट ऑफ़ एप्लाइड आर्ट’  में दाखिला लिया।

कॉलेज की फीस उन दिनों 120 रुपये हुआ करती थी, जिसे चुकाने के लिए वह फैमिली प्लानिंग के पोस्टर बनाने का काम करते थे। पोस्टर रंगने वाले हाथों को यहाँ कला की विधिवत शिक्षा मिली, जिसने उनके भीतर के कलाकार को तराशा।

थिएटर की राह और अभिनय का सफर

नाना के पिता को नाटक देखने का बेहद शौक था और वही आदत उन्होंने नाना में भी डाली। स्कूल के दिनों से ही नाना ने नाटकों में भाग लेना शुरू कर दिया था। जे.जे. स्कूल में पढ़ाई के दौरान कॉलेज के डीन, जो खुद थिएटर के एक बड़े निर्देशक थे, ने नाना की प्रतिभा को पहचाना।

पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने एक विज्ञापन एजेंसी में काम शुरू किया, जहाँ उन्हें 1,200 रुपये की सैलरी मिलती थी। एक आम इंसान के लिए यह एक सुरक्षित और अच्छी नौकरी थी, लेकिन नाना का मन तो रंगमंच की ओर खींच रहा था। उन्होंने अभिनय के अपने जुनून के लिए इस नौकरी को छोड़ दिया और ‘अविष्कार’ नाम की प्रसिद्ध थिएटर मंडली से जुड़ गए।

दिग्गज निर्देशिका विजया मेहता के निर्देशन में उनका पहला कमर्शियल नाटक हुआ। थिएटर में उनके अभिनय की छाप ऐसी पड़ी कि धीरे-धीरे फ़िल्म जगत के दरवाजे उनके लिए खुलने लगे। फ़िल्मों में आने के बाद भी उन्होंने कभी अपनी जड़ों को नहीं भुलाया।

कारगिल युद्ध के दौरान भी सेना के साथ रहे

नाना पाटेकर के जीवन का सबसे अनोखा पहलू था उनका भारतीय सेना से लगाव। 1991 में जब वह अपनी निर्देशित पहली फ़िल्म ‘प्रहार’ की तैयारी कर रहे थे, तो उन्होंने केवल कैमरे के सामने अभिनय करने के बजाय किरदारों की असलियत को जीने का फैसला किया।

उन्होंने मराठा लाइट इन्फेंट्री के साथ लगातार तीन साल तक कठिन सैन्य प्रशिक्षण लिया। उनकी इस लगन और समर्पण को देखते हुए 1990 के दशक में उन्हें टेरिटोरियल आर्मी  में मानद कैप्टन का पद दिया गया।

उनकी असली परीक्षा 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान हुई। जब देश की सीमाओं पर तनाव बढ़ा, तो नाना ने तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फ़र्नांडिस से मिलकर खुद मोर्चे पर जाने की अनुमति मांगी। रिपोर्टों के अनुसार, वह द्रास, कुपवाड़ा, बारामुला और सोपोर जैसे संवेदनशील इलाकों में गए। उन्होंने सैनिकों के साथ गश्त में हिस्सा लिया और सैन्य अस्पतालों में समय गुजारा। वह बाद में खुद बताया करते थे कि जब वह श्रीनगर गए थे तब उनका वजन 76 किलो था, लेकिन जब वह लौटे तो घट कर 56 किलो रह गया था।

डेढ़ करोड़ की कार, जो किसानों के नाम हो गई

नाना पाटेकर के व्यक्तित्व को सबसे अच्छी तरह समझाने वाला एक किस्सा लेखक और सहकर्मी रणबीर पुष्प ने एक साक्षात्कार में साझा किया था।

एक शाम नाना अपने घर पर टीवी पर किसान आत्महत्याओं की खबरें देख रहे थे। अगले ही दिन उन्हें अपने लिए डेढ़ करोड़ रुपये की एक लग्जरी कार खरीदनी थी। लेकिन किसानों की बदहाली देखकर उनका मन भर आया।

अगली सुबह उन्होंने गाड़ी खरीदने का फैसला रद्द कर दिया और शोरूम में फोन करके मना कर दिया। उन्होंने उस रकम के 15-15 हजार रुपये के चेक बनवाए और पीड़ित किसान परिवारों में बांटने का फैसला किया।

यही सोच आगे चलकर ‘नाम फाउंडेशन’  के रूप में सामने आई। मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर शुरू की गई इस संस्था ने महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त इलाकों में किसानों की मदद का बीड़ा उठाया। लातूर में 62 पीड़ित परिवारों को आर्थिक सहायता देने वह खुद पहुंचे।

उन्होंने विधवा महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए सिलाई मशीनें बांटीं। नाना खुद एक किसान थे, अपने खेत में गेहूं और चावल उगाते थे और फसल की कमाई जरूरतमंदों में बांट दिया करते थे।

शोहरत और सफलता की ऊंचाइयों पर पहुंचने के बावजूद नाना पाटेकर हमेशा एक साधारण इंसान ही बने रहे। मुंबई के अपने छोटे से फ्लैट में रहना, खुद अपने हाथों से खाना बनाना और जमीन से जुड़े रहना उनकी खासियत रही। उन्होंने अपने बेटे मल्हार को कभी अपने नाम या पहचान का सहारा नहीं दिया और उसे अपने दम पर संघर्ष करने की सीख दी।

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