इतिहास अक्सर उन लोगों के नाम बड़े अक्षरों में लिखता है जो महलों में पैदा होते हैं, लेकिन असल ज़िंदगी की स्याही उन कागजों से बनती है जो गरीबी की धूप में सुखाए जाते हैं। आज कादर खान की बर्थ एनिवर्सरी पर जब हम उनके सफर को याद करते हैं, तो पर्दे के पीछे का वह सच सामने आता है जिसने एक भूखे पेट सोने वाले लड़के को भारत का सबसे बड़ा संवाद लेखक बना दिया।
अगर कादर खान की कहानी के पन्नों को पलटा जाए, तो उन का जीवन किसी कल्पना से भी ज्यादा कठोर और संघर्षपूर्ण रहा है।
काबुल से मुंबई का सफर
कादर खान का जन्म काबुल (अफगानिस्तान) में हुआ था। उनके जन्म से पहले उनके तीन बड़े भाइयों की महज दो से तीन साल की उम्र में काबुल की ठंड और बीमारियों के कारण मौत हो चुकी थी। उनकी माँ ने इस डर से काबुल छोड़ने का फैसला किया कि कहीं कादर को भी वे खो न दें। परिवार मुंबई आया और कामाठीपुरा-नागपड़ा के उस इलाके में रहने लगा, जिसे उस दौर में रेड लाइट एरिया और अपराध का केंद्र माना जाता था।
मुंबई आकर भी स्थितियां नहीं बदलीं। कादर खान ने अपने साक्षात्कारों में स्वीकार किया है कि उनके घर में हफ्ते में कई दिन ऐसे आते थे जब रात को खाना नहीं बनता था। उन्हें और उनके परिवार को अक्सर भूखे पेट ही सोना पड़ता था।
कब्रिस्तान में जाकर करते थे रिहर्सल
जब कादर खान महज 8-9 साल के थे, तो घर की गरीबी से परेशान होकर उन्होंने पढ़ाई छोड़कर पास की एक लोकल मिल में काम करने का फैसला किया। वहाँ बच्चों को रोज़ के 4 आने से 8 आने मिल जाते थे। जब वह अपने दोस्तों के साथ काम पर जाने लगे, तो उनकी माँ इकबाल बेगम ने उन्हें रास्ते में रोक लिया।
उनकी माँ ने उनका हाथ पकड़ा और कहा— “तुम मिल में काम करने नहीं जाओगे। जो 4-8 आने तुम कमाकर लाओगे, उससे हमारे घर की गरीबी दूर नहीं होगी। अगर गरीबी खत्म करनी है, तो तुम्हें पढ़ना होगा।”
माँ की इस सीख के बाद कादर खान पढ़ाई करने लगे, लेकिन दिल में जो तंगी का दर्द और गुस्सा था, उसे निकालने के लिए उन्होंने एक अजीब रास्ता चुना। रात के समय, जब नागपड़ा की गलियाँ सो जाती थीं, तो कादर खान अपने घर के पास स्थित कब्रिस्तान चले जाते थे। वहाँ कब्रों के बीच अकेले खड़े होकर वह जोरों से चिल्लाते थे, नाटकों के संवाद बोलते थे और खुद ही अपनी आवाज़ की गूँज सुनते थे।
एक रात जब वह कब्रिस्तान में ज़ोर-ज़ोर से डायलॉग बोल रहे थे, तभी वहाँ से गुज़र रहे एक टॉर्च की रोशनी उन पर पड़ी। वह रोशनी उस ज़माने के मशहूर थिएटर आर्टिस्ट अशरफ खान की थी। अशरफ खान ने उस छोटे से लड़के की आवाज़ में गहरा दर्द और कशिश महसूस की। उन्होंने कादर खान को बुलाया और अपने नाटक ‘लोकल टॉक’ में बाल कलाकार की भूमिका दे दी। यही वह पल था जिसने कादर खान को पहली बार रंगमंच और अभिनय की दुनिया से जोड़ा।
जब ‘रोटी’ के एक सीन ने बदली किस्मत
कादर खान ने सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और ‘एम.एच. साबू सिद्दीक पॉलीटेक्निक’ कॉलेज में प्रोफेसर बन गए। लेकिन नाटकों से उनका नाता नहीं टूटा। कॉलेज के एक नाटक के दौरान मशहूर अभिनेता दिलीप कुमार ने उनका अभिनय देखा और तुरंत उन्हें अपनी फिल्म बैराग (1976) में ब्रेक दे दिया।
लेकिन एक डायलॉग राइटर के तौर पर उनकी किस्मत तब बदली जब मनमोहन देसाई ने उन्हें फिल्म रोटी (1974) के संवाद लिखने का काम दिया। मनमोहन देसाई अपनी फिल्मों के संवादों को लेकर बेहद सख्त थे। उन्होंने कादर खान से कहा था कि अगर संवाद पसंद आए तो सिर पर बैठाऊँगा, नहीं आए तो उठाकर फेंक दूंगा।
कादर खान ने पूरी रात जागकर रोटी फिल्म के क्लाइमेक्स के संवाद लिखे। अगले दिन जब उन्होंने मनमोहन देसाई को वे संवाद सुनाए, तो मनमोहन देसाई इतने भावुक हो गए कि उन्होंने अपने कमरे से जाकर एक सोने की घड़ी, एक पोर्टेबल टीवी और 1,200 रुपये नकद लाकर कादर खान के हाथों में रख दिए। उस ज़माने में एक डायलॉग राइटर को बहुत कम पैसे मिलते थे, लेकिन इस घटना के बाद कादर खान बॉलीवुड के सबसे महंगे और मांग वाले संवाद लेखक बन गए।
अमिताभ बच्चन और ‘सुपरस्टार’ दौर का संवाद सम्राट
70 और 80 के दशक में अमिताभ बच्चन को ‘एंग्री यंग मैन’ बनाने में जितना योगदान सलीम-जावेद की कहानियों का था, उतना ही योगदान कादर खान के संवादों का भी था। मुकद्दर का सिकंदर, लावारिस, कुली, अमर अकबर एंथनी, अग्निपथ, सुहाग और नसीब जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्मों के संवाद कादर खान ने ही लिखे थे।
एक लेखक के तौर पर उनकी खूबी यह थी कि वह आम बोलचाल की सड़कछाप भाषा से लेकर गालिब की शायरी जैसे भारी-भरकम और दार्शनिक शब्द एक ही सीन में पिरो देते थे। बाद में 90 के दशक में उन्होंने गोविंदा के साथ मिलकर कॉमेडी सिनेमा का एक नया दौर शुरू किया, जिसने भारतीय सिनेमा के हर वर्ग के दर्शक का मनोरंजन किया।