इजरायल की राजनीति में एक कहावत सटीक बैठती है – अकेली लकड़ी आसानी से टूट जाती है, गट्ठर नहीं टूटता। अलग-अलग लड़ने पर जिन अरब पार्टियों का असर सीमित रहता था, वही आज सत्ता का समीकरण बदलने की स्थिति में हैं।
7 अक्टूबर 2023 के हमलों और गाजा युद्ध के बाद हुए इस पहले चुनाव में मतदाताओं ने रिकॉर्ड 77.7 फीसदी मतदान किया — 1999 के बाद सबसे ज्यादा। लेकिन किसी एक खेमे को स्पष्ट जीत नहीं मिली।
रुझानों में किसी को बहुमत नहीं
मतगणना के रुझानों (करीब 85 फीसदी गिनती के आधार पर चुनाव आयोग के अनुमान) के मुताबिक नेतन्याहू के दक्षिणपंथी-धार्मिक ब्लॉक को करीब 54 सीटें, पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट के ‘बदलाव ब्लॉक’ को करीब 47 सीटें और अरब पार्टियों को कुल 19 सीटें मिलती दिख रही हैं। नेतन्याहू की लिकुड 27-28 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी हुई है, लेकिन ब्लॉक का गणित अधूरा है।
यहीं से किंगमेकर की कहानी शुरू होती है। नेतन्याहू को बहुमत के लिए सिर्फ 7 सीटें चाहिए – और रा’अम के पास ठीक 7 हैं। दूसरी तरफ आइजेनकोट को 14 सीटें चाहिए, यानी उन्हें जॉइंट लिस्ट और रा’अम दोनों का साथ चाहिए। अंतिम गिनती 30 अक्टूबर तक पूरी होगी और आधिकारिक परिणाम 4 नवंबर को आएंगे। उसके बाद राष्ट्रपति इसाक हर्त्ज़ोग किसी एक नेता को सरकार बनाने का अवसर देंगे, जिसके पास 42 दिन होंगे।
अरब पार्टियों को 19 सीटों पर बढ़त
यह समझना जरूरी है कि 2026 में अरब पार्टियां एक ही बैनर तले नहीं लड़ीं। हदाश, ता’अल और बलाद ने मिलकर ‘जॉइंट लिस्ट’ बनाई, जिसके अध्यक्ष यूसुफ जाबरीन हैं – इस सूची को करीब 12 सीटें मिल रही हैं। चौथी पार्टी रा’अम (यूनाइटेड अरब लिस्ट) मंसूर अब्बास के नेतृत्व में अलग से लड़ी और उसे करीब 7 सीटें मिली हैं। रा’अम ने एकजुट सूची का प्रस्ताव ठुकराकर जानबूझकर अलग राह चुनी, क्योंकि उसका लक्ष्य चुनाव के बाद सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल होना है।
दोनों सूचियों को मिलाकर अरब पार्टियां पिछली नेसेट की 10 सीटों से छलांग लगाकर 19 पर पहुंची हैं – यह उनका अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है।
सफर कहां से शुरू हुआ
1948 में इजरायल के गठन के समय जो फिलिस्तीनी अरब वहां रह गए, वे आज देश की आबादी का करीब 21 फीसदी हैं। अरब संसदीय राजनीति की पहली धुरी कम्युनिस्ट पार्टी बनी, जिसने 1949 के पहले चुनाव में हिस्सा लिया। 1976 के ‘लैंड डे’ आंदोलन के बाद 1977 में हदाश (डेमोक्रेटिक फ्रंट फॉर पीस एंड इक्वेलिटी) बना – अरब-यहूदी साझा मंच, जो दो-राष्ट्र समाधान और पूर्ण नागरिक समानता की बात करता है।
1970 के दशक में ही राष्ट्रवादी धारा ‘अबना अल-बलाद’ उभरी, जो नेसेट चुनावों के बहिष्कार की पक्षधर रही। इसी दौर में शेख अब्दुल्ला निम्र दरवेश के नेतृत्व में इस्लामिक मूवमेंट का उदय हुआ। 1996 में यह आंदोलन दो हिस्सों में बंट गया – दक्षिणी शाखा ने संसदीय राजनीति का रास्ता अपनाया, जबकि शेख राएद सलाह की उत्तरी शाखा ने नेसेट की वैधता मानने से इनकार कर दिया; उसे 2015 में गैरकानूनी घोषित कर दिया गया।
1990 के दशक में तीन और पार्टियां मैदान में आईं – अजमी बिशारा की बलाद (1995), जो इजरायल को ‘उसके सभी नागरिकों का राज्य’ बनाने की मांग करती है और आज सामी अबू शहादेह के नेतृत्व में है; अहमद तीबी की ता’अल (1996); और इस्लामिक मूवमेंट की दक्षिणी शाखा से बनी रा’अम (1996), जो आज मंसूर अब्बास के नेतृत्व में ‘प्रतिनिधित्व नहीं, प्रभाव’ की राजनीति करती है।
2014 में चुनावी थ्रेशहोल्ड 3.25 फीसदी किए जाने के बाद चारों पार्टियां एक हुईं। 2015 में जॉइंट लिस्ट ने 13 सीटें जीतकर नेसेट की तीसरी बड़ी ताकत बनने का इतिहास रचा और मार्च 2020 में यह आंकड़ा 15 तक पहुंचा। लेकिन 2021 में रा’अम अलग हो गई और बेनेट-लापिड सरकार में शामिल होकर किसी सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल होने वाली पहली स्वतंत्र अरब पार्टी बन गई – बदले में अरब समाज के लिए बड़े बजट और योजनाएं हासिल कीं। 2022 में बिखराव की कीमत चुकानी पड़ी: चारों पार्टियों को कुल सिर्फ 10 सीटें मिलीं और बलाद थ्रेशोल्ड भी पार नहीं कर पाई। 2026 का नतीजा उसी सबक का परिणाम है – एकजुटता जहां हुई, वहां ताकत लौट आई।
अब क्या होगा आगे का रास्ता
किंगमेकर की स्थिति का मतलब यह नहीं कि रास्ता आसान है। नेतन्याहू के गठबंधन में बेन-गवीर और स्मोट्रिच जैसे धुर दक्षिणपंथी नेता अरब पार्टी के साथ सरकार में बैठने के ऐतिहासिक विरोधी रहे हैं। आइजेनकोट के खेमे में भी कई नेता अरब पार्टियों के साथ औपचारिक गठबंधन से हिचकते रहे हैं – बाहर से समर्थन जैसा बीच का रास्ता निकल सकता है। लेकिन गणित साफ है: जो भी सरकार बनेगी, उसे अरब पार्टियों की शर्तें सुननी होंगी – अरब शहरों के लिए बजट, बढ़ते अपराध पर कार्रवाई और बुनियादी सुविधाओं में समानता जैसी मांगें अब हर मोलभाव की मेज के केंद्र में होंगी। लकड़ियों का गट्ठर इस बार सचमुच भारी पड़ रहा है।