अमेरिका ने इराक में मौजूद अपने बचे हुए सैनिकों को बुद्धवार 30 सितंबर को वापस बुला लिया। इसके साथ ही मध्य पूर्व की पूरी तस्वीर बदलकर रख देने वाली दो दशकों से भी ज्यादा पुरानी अमेरिकी सैन्य मौजूदगी का अंत हो गया।
इसकी शुरूआत 20 मार्च 2003 की उस सुबह से हुई थी जब, बगदाद के दौरा फार्म्स पर पहली अमेरिकी टोमाहॉक मिसाइल गिरी थी, तब से लेकर आज तक इराक ने खून-खराबे, तबाही और सत्ता के बदलाव का एक ऐसा दौर देखा है जिसने वहां के आम लोगों की जिंदगी पूरी तरह बदलकर रख दी।
उस वक्त की सद्दाम हुसैन की हुकूमत गिरने के बाद इराक बरसों तक सांप्रदायिक हिंसा और उग्रवाद की आग में झुलसता रहा। इस बीच अमेरीकी सेना कई सालों तक इराक में रही।
साल 2011 में अमेरिकी सेना एक बार इराक से वापस लौट गई थी, लेकिन 2014 में जब इस्लामिक स्टेट (ISIS) का खौफनाक उभार हुआ, तो उसे हराने में मदद के लिए अमेरिकी सैनिकों को ‘ऑपरेशन इनहेरेंट रिजॉल्व’ के तहत एक बार फिर लौटना पड़ा।
अब 2026 में सैनिकों की यह विदाई ऐसे वक्त में हो रही है जब ईरान के साथ जारी खिंचाव ने इलाके में तनाव बढ़ा रखा है।
हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है कि फौज भले ही लौट रहे हों, लेकिन इराक में अमेरिका का असर इतनी आसानी से खत्म नहीं होगा।
दो दशक से ज्यादा की लड़ाई
2003 में सद्दाम हुसैन के पास सामूहिक विनाश के हथियार होने के दावों के साथ जब हमले की शुरुआत हुई, तो इराक की राजनीति ही नहीं, बल्कि आम नागरिकों का सामाजिक ढांचा भी बिखर गया।
हमले के बाद सद्दाम की सरकार तो गिर गई, लेकिन देश हिंसा और उग्रवाद के उस दलदल में फंस गया जहाँ लाखों बेगुनाह इराकियों और हज़ारों सैनिकों ने अपनी जानें गँवाईं।
2011 में अमेरिका के जाने के बाद जब ISIS ने उत्तरी इराक पर कब्जा जमाया, तो अमेरिकी सेना को इराकी बलों को दोबारा संभालने और ट्रेनिंग देने के लिए फिर से मैदान में उतरना पड़ा।
अमेरिकी सैनिकों की भूमिका को कॉम्बैट ऑपरेशन से हटाकर सिर्फ सलाह और ट्रेनिंग तक सीमित कर दिया गया, जो 30 सितंबर 2026 को पूरी सैन्य वापसी पर जाकर खत्म हुई।
इराक की आजादी का दावा और नई चुनौतियाँ
इराकी सरकार के लिए सैनिकों का जाना “राष्ट्रीय संप्रभुता की पूरी बहाली” जैसा है। इराक के सुरक्षा बलों का कहना है कि वे अब अपनी सीमाओं की रक्षा करने और आतंकवाद से खुद निपटने में पूरी तरह सक्षम हैं। फिर भी, इस विदाई के बाद कई ऐसे बड़े सवाल हैं जो हवा में तैर रहे हैं.
इनमें पहला यह कि क्या अमेरिकी सेना के हटने के बाद इराक की अंदरूनी राजनीति और सुरक्षा ढांचे में ईरान समर्थित शिया गुटों का दबदबा और बढ़ने का अंदेशा है।
इसके अलावा उत्तरी इराक के कुर्द बहुल इलाके (KRI) में अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी सुरक्षा का एक बड़ा सहारा मानी जाती थी। अब बगदाद और एरबिल के रिश्तों का संतुलन बनाए रखना एक चुनौती होगा।
वहीं अमेरिकी रक्षा मंत्रालय (पेंटागन) ने भी साफ किया है कि सैनिकों की वापसी का मतलब रास्ते अलग होना नहीं है। आगे भी दोनों मुल्कों के बीच खुफिया जानकारी साझा करने और राजनयिक स्तर पर सहयोग जारी रहेगा।