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डॉक्टर से सीनेटर तक: अब्दुल अल-सैयद की कहानी और उनका भारत कनेक्शन

मिशिगन से सीनेट चुनाव जीतकर अब्दुल अल-सैयद अमेरिकी इतिहास के पहले मुस्लिम सीनेटर बन गए हैं। पेशे से डॉक्टर अल-सैयद का भारत से एक निजी और गहरा रिश्ता भी है ।

अमेरिका के मध्यावधि चुनावों में इस बार सबसे अधिक चर्चा जिस नतीजे की है, वह मिशिगन की सीनेट सीट का है। डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार अब्दुल अल-सैयद ने रिपब्लिकन उम्मीदवार माइक रॉजर्स को हराकर यह सीट जीत ली है।

रॉयटर्स और एसोसिएटेड प्रेस (एपी) के अनुमानों के अनुसार, इस जीत के साथ अल-सैयद अमेरिकी सीनेट के लिए चुने जाने वाले पहले मुस्लिम बन गए हैं। वे जनवरी में शपथ लेंगे। यह सीट डेमोक्रेट सीनेटर गैरी पीटर्स के रिटायर होने से खाली हुई थी, और इस पर कब्ज़ा दोनों दलों के लिए सीनेट के बहुमत की लड़ाई में अहम माना जा रहा था

चुनाव से पहले सीनेट में रिपब्लिकन 53-47 से आगे थे। चुनावी रात डेट्रॉइट में अपने समर्थकों के सामने अल-सैयद ने अपना पूरा नाम  अब्दुलरहमान मोहम्मद अल-सैयद  लेकर कहा कि उन्हें मिशिगन के सीनेटर-चुनित के रूप में खड़े होने पर गर्व है।

जीत आसान नहीं थी

माइक रॉजर्स पूर्व सांसद हैं और उन्हें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तथा राष्ट्रीय रिपब्लिकन नेतृत्व का समर्थन हासिल था। भारतीय मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार, अल-सैयद ने उन्हें एक लाख से अधिक वोटों के अंतर से हराया; एपी ने अमेरिकी समयानुसार देर रात नतीजा घोषित किया, जब अल-सैयद स्पष्ट बढ़त पर थे।

उनकी अपनी पार्टी के भीतर की लड़ाई भी कठिन थी। अगस्त 2026 के डेमोक्रेटिक प्राइमरी में उन्होंने सांसद हेली स्टीवंस को हराया था। रिपोर्टों के अनुसार, स्टीवंस ने अंतिम समय में रॉजर्स का समर्थन कर सबको चौंका दिया था, फिर भी नतीजा अल-सैयद के पक्ष में गया। प्रचार के दौरान उनके धर्म को लेकर हमले भी हुए।

रॉयटर्स के अनुसार, रिपब्लिकन खेमे ने उन पर मुस्लिम ब्रदरहुड से संबंधों के आरोप लगाए अल-सैयद ने इन्हें नकारा है और इन आरोपों का कोई सबूत सामने नहीं आया।

 स्वास्थ्य अधिकारी का पद छोड़कर राजनीति में आए

अब्दुलरहमान मोहम्मद अल-सैयद का जन्म 31 अक्टूबर 1984 को मिशिगन के रोचेस्टर हिल्स में हुआ। उनके पिता मोहम्मद मिस्र से पढ़ाई के लिए अमेरिका आए प्रवासी थे। अल-सैयद ने मिशिगन यूनिवर्सिटी से जीवविज्ञान और राजनीति विज्ञान की पढ़ाई की। इसके बाद वे रोड्स स्कॉलर के रूप में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी गए, जहाँ से उन्होंने जन-स्वास्थ्य में डॉक्टरेट किया। 2014 में उन्होंने कोलंबिया यूनिवर्सिटी से चिकित्सा की डिग्री (एमडी) ली और वहीं महामारी विज्ञान के सहायक प्रोफेसर भी रहे।

2015 में, महज 30 वर्ष की उम्र में, वे डेट्रॉइट के स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख बने  किसी बड़े अमेरिकी शहर के सबसे युवा स्वास्थ्य अधिकारियों में से एक। 2017 में यह पद छोड़कर वे राजनीति में आए और 2018 में मिशिगन के गवर्नर पद के लिए डेमोक्रेटिक प्राइमरी लड़े, जहाँ वे ग्रेचेन व्हिटमर के बाद दूसरे स्थान पर रहे।

बाद में वे वेन काउंटी के स्वास्थ्य और मानव सेवा विभाग के निदेशक बने, जिसके दायरे में करीब 18 लाख निवासी आते हैं; वहाँ उन्होंने इलाज के कर्ज़ से राहत जैसे कार्यक्रम चलाए। अप्रैल 2025 में उन्होंने सीनेट चुनाव के लिए यह पद छोड़ा।

उनका अभियान मुख्य रूप से तीन बातों पर केंद्रित था  सबके लिए स्वास्थ्य सेवा, कामकाजी परिवारों का बढ़ता खर्च घटाना, और राजनीति में बड़ी कंपनियों के पैसे का प्रभाव कम करना। एक सटीकता यहाँ ज़रूरी है: चिकित्सा की डिग्री के बावजूद अल-सैयद ने मरीज़ों के इलाज वाली निजी प्रैक्टिस का रास्ता नहीं चुना; उनका पूरा करियर जन-स्वास्थ्य तंत्र और प्रशासन का रहा है, और चुनाव में विरोधियों ने इस बात पर सवाल भी उठाए थे।

भारत से क्या है ताल्लुक

अल-सैयद का भारत से रिश्ता उनकी पत्नी डॉ. सारा जुकाकू के माध्यम से है। सारा पेशे से मनोचिकित्सक हैं। उनका जन्म और पालन-पोषण मिशिगन में ही हुआ, लेकिन उनके परिवार की जड़ें कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ ज़िले के तटीय शहर भटकल में हैं — मंगलुरु से करीब 140 किलोमीटर दूर, लगभग 46 हज़ार की आबादी वाला यह शहर सदियों पुरानी समुद्री व्यापार परंपरा और नवायत समुदाय के लिए जाना जाता है।

सारा के दादा, जे.एच. शम्सुद्दीन जुकाकू, भटकल के जाने-माने वकील और शिक्षाविद थे। वे तत्कालीन मैसूर राज्य में मुख्यमंत्री बी.डी. जत्ती के कार्यकाल में वित्त उप-मंत्री रहे थे। सारा के पिता, डॉ. जुकाकू एस. तैयब, भटकल में ही पले-बढ़े; उन्होंने 1976 में बेंगलुरु मेडिकल कॉलेज से पढ़ाई पूरी की और बाद में गुर्दा-रोग विशेषज्ञ के रूप में मिशिगन में बस गए। परिवार के अधिकांश सदस्य अब बेंगलुरु में रहते हैं, जबकि सारा का निकट परिवार अमेरिका में है। बताया जाता है कि डॉ. तैयब अपने बच्चों को बचपन में बेंगलुरु और भटकल ले जाते रहे, ताकि वे अपनी जड़ों से जुड़े रहें।

अब्दुल और सारा की मुलाकात मिशिगन यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान हुई; दोनों वहाँ के मुस्लिम स्टूडेंट्स एसोसिएशन से जुड़े थे। मई 2006 में दोनों की शादी हुई  उस समय सारा 19 वर्ष की थीं। उनकी दो बेटियाँ हैं, एमली और सरीन। परिवार एन आर्बर, मिशिगन में रहता है।

अल-सैयद इस रिश्ते पर खुलकर और मज़ाकिया अंदाज़ में बात कर चुके हैं। ‘पीपल’ पत्रिका को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था, “देखिए, मेरी शादी एक दक्षिण भारतीय परिवार में हुई है और मुझे 20 साल हो चुके हैं। अब मैं पूरी तरह इसमें घुल-मिल गया हूँ। सच कहूँ तो, शायद मैं अरब होने से ज़्यादा भारतीय हूँ।” एक अन्य बातचीत में उन्होंने कहा, “मेरी ज़िंदगी देसी महिलाओं से घिरी रही है — मेरी पत्नी देसी है और मेरी दो बेटियाँ भी देसी हैं।”

क्यों ऐतिहासिक है यह जीत

अमेरिकी कांग्रेस के उच्च सदन, सीनेट, में अब तक कोई मुस्लिम सदस्य नहीं पहुंचा था। मुस्लिम नेता इससे पहले निचले सदन, प्रतिनिधि सभा, तक ही चुने जाते रहे हैं। अल-सैयद की जीत ने वह दरवाज़ा पहली बार खोला है। मिशिगन जैसे प्रतिस्पर्धी राज्य से, जहाँ 1994 के बाद कोई रिपब्लिकन सीनेटर नहीं चुना गया, एक प्रवासी परिवार के बेटे और खुले तौर पर प्रगतिशील एजेंडा रखने वाले उम्मीदवार की यह जीत अमेरिकी राजनीति में बदलते समीकरणों का संकेत भी मानी जा रही है। जनवरी में शपथ के बाद वे औपचारिक रूप से सीनेटर का पद संभालेंगे।

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