हर साल लाखों नौजवान बड़ी-बड़ी उम्मीदों और हाथ में फाइल दबाकर कॉलेज के दरवाजों से बाहर निकलते हैं। मन में एक ही उम्मीद होती है-अब एक अच्छी और मनपसंद नौकरी मिलेगी। लेकिन हकीकत की जमीन पर कदम रखते ही यह सपना टूटने लगता है। भारत में पढ़ाई का दायरा तो बढ़ा है, लेकिन क्या वो पढ़ाई हमें काम के काबिल बना रही है? यह एक ऐसा सवाल है जो आज देश के हर दूसरे परिवार की चिंता बन चुका है।
नीति आयोग के चौंकाने वाला आंकड़े
अगस्त में जारी नीति आयोग की रिपोर्ट ‘2047 में विकसित भारत के लिए कौशल विकास की पुनर्कल्पना’ (Reimagining Skill Development for Viksit Bharat 2047) देश में शिक्षा और रोजगार के बीच की गंभीर खाई को उजागर करती है। आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के हवाले से रिपोर्ट बताती है कि भारत में केवल 8.25% ग्रेजुएट ही अपनी पढ़ाई और योग्यता के अनुरूप नौकरियों में काम कर रहे हैं। 15 से 29 वर्ष की उम्र के करीब 8.7 करोड़ युवा ऐसे हैं जो ‘NEET’ श्रेणी (‘Not in Education, Employment, or Training) में आते हैं-यानी वे न तो किसी पढ़ाई में हैं, न रोजगार में और न ही किसी ट्रेनिंग में।
देश में करीब 3.4 करोड़ छात्र ग्रेजुएशन कर रहे हैं, जिनमें से 2 करोड़ से ज्यादा छात्र सामान्य कोर्स जैसे बीए, बीएससी और बीकॉम में हैं। नीति आयोग और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के अनुसार, समस्या यह नहीं है कि ये डिग्रियां बेकार हैं। समस्या यह है कि इनसे नियोक्ता को यह समझ नहीं आता कि छात्र के पास वास्तव में क्या कौशल है।
34% छात्र मानते हैं कि पढ़ाई के दौरान हुनर न सीख पाना सबसे बड़ी बाधा है। 80% शिक्षार्थियों का कहना है कि उनकी डिग्री में इंडस्ट्री से जुड़ाव और प्रैक्टिकल काम की भारी कमी थी। शुरुआती स्तर की नौकरियों के लिए भी कंपनियां एमएस ऑफिस, टैली, डिजिटल और कम्युनिकेशन स्किल्स चाहती हैं, जो सामान्य कॉलेजों में नहीं सिखाया जाता।
सरकारी नौकरी की अंधी दौड़
क्लासरूम और कंपनियों की मांग में इसी अंतर के कारण युवा सुरक्षित भविष्य की तलाश में सरकारी नौकरियों की ओर भागते हैं। स्थिति कितनी भयावह है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नवंबर 2024 से जुलाई 2025 के बीच केवल 55,000 सरकारी पदों के लिए 1.86 करोड़ युवाओं ने आवेदन किया।
अगर इस संकट को कुछ और वैश्विक और राष्ट्रीय अध्ययनों से समझें, तो तस्वीर और स्पष्ट होती है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की ‘इंडिया एम्प्लॉयमेंट रिपोर्ट 2024‘ के अनुसार, भारत में कुल बेरोजगार आबादी में लगभग 83% हिस्सेदारी युवाओं की है। इतना ही नहीं, अनपढ़ युवाओं की तुलना में पढ़े-लिखे (ग्रेजुएट) युवाओं में बेरोजगारी की दर कहीं अधिक दर्ज की गई है। वहीं सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) के आंकड़े बताते हैं कि भारत में 20 से 24 वर्ष के आयु वर्ग में बेरोजगारी दर सबसे ज्यादा रहती है, क्योंकि इसी उम्र में छात्र डिग्री लेकर निकलते हैं और उनके पास अनुभव नहीं होता।
समाधान की राह क्या हो सकती है?
नीति आयोग और उद्योग विशेषज्ञों का सुझाव है कि सिर्फ सरकारी नौकरियों के भरोसे रहकर इस समस्या को हल नहीं किया जा सकता। कॉलेजों को केवल नाममात्र की इंटर्नशिप के बजाय छात्रों को वास्तविक वर्कप्लेस एक्सपीरियंस देना होगा। कम आय वाले परिवारों के छात्रों के लिए जॉब-ओरिएंटेड वोकेशनल कोर्स और डिजिटल स्किल्स की ट्रेनिंग मुफ्त या कम फीस पर उपलब्ध करानी होगी। युवाओं को सिर्फ ‘नौकरी मांगने वाला’ बनाने के बजाय ‘नौकरी देने वाला’ या अपना काम शुरू करने के योग्य बनाना होगा।
