संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 450 साल से चले आ रहे दुनिया के पारंपरिक नक्शे को बदलकर एक नया ‘इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन’ अपनाने का प्रस्ताव पारित किया है। जो अफ़्रीका के आकार को ज़्यादा सटीक रूप से दिखाता है।
इस ऐतिहासिक वोटिंग में प्रस्ताव के पक्ष में 164 देशों ने मतदान किया जिनमें भारत, ब्रिटेन और फ्रांस शामिल थे, जबकि अमेरिका ऐसा इकलौता देश था जिसने इसका विरोध किया। इस बदलाव का मुख्य उद्देश्य महाद्वीपों के उनके वास्तविक भौगोलिक आकार को दिखाना है। हालाँकि, इस प्रस्ताव के तुरंत बाद भारत में एक नया कूटनीतिक विवाद खड़ा हो गया है।
भारत को आपत्ति क्यों है?
वरिष्ठ पत्रकार सुहासिनी हैदर ने अपने एक्स अकांउट पर पोस्ट करते हुए लिखा है, “जारी किए गए नए नक़्शे में जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्सों को पाकिस्तान और चीन के हिस्से का हिस्सा दिखाया गया है.”
रविवार को भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने सख्त लहजे में स्पष्टीकरण जारी किया। भारत सरकार ने कहा:
“यह प्रस्ताव किसी विशिष्ट नक्शे या सीमाओं के चित्रण को प्रमाणित नहीं करता। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत के अभिन्न और संप्रभु अंग हैं। भारत की क्षेत्रीय अखंडता का कोई भी भ्रामक चित्रण स्वीकार्य नहीं होगा।”
भारत का रुख साफ़ है-वह समान क्षेत्रफल वाले नक्शे के सिद्धांत का समर्थन करता है, लेकिन अपनी अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के साथ किसी समझौते को स्वीकार नहीं करेगा।
457 साल पुराने नक्शे को क्यों बदला गया
मर्केटर नक्शा जो कि दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाल नक्शा है। जिसे 1569 में फ़्लैमिश कार्टोग्राफ़र जेरार्डस मर्केटर ने जहाजों के समुद्री रास्तों को आसान बनाने के लिए बनाया था। गोल पृथ्वी को सपाट पन्ने पर दिखाने के चक्कर में इसमें एक बड़ी भौगोलिक विकृति आ गई। जिससे इसमें देशों और महाद्वीपों का आकार असल से अलग नजर आने लगता है।
जो देश भूमध्य रेखा से जितने दूर थे वे नक्शे पर उतने ही विशालकाय दिखने लगे। पुराने नक्शे में ग्रीनलैंड और अफ़्रीका का आकार लगभग एक जैसा दिखता है। जबकि वास्तविकता में अफ़्रीका ग्रीनलैंड से 14 गुना बड़ा है!
अफ़्रीकी देशों का तर्क था कि इस गलत चित्रण से दुनिया के मन में उनके आर्थिक और राजनीतिक महत्व को कम करके आंकने की मानसिकता बनी।
संयुक्त राष्ट्र की यह वोटिंग कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है। यानी गूगल मैप्स या किताबें छापने वाले पब्लिशर्स इसे तुरंत बदलने के लिए बाध्य नहीं हैं। हालाँकि, फ्रांस जैसे देशों ने पहले ही घोषणा कर दी है कि वे अपने स्कूलों में मर्केटर नक्शा हटाकर नया ‘इक्वल अर्थ’ या ‘एकर्ट IV’ नक्शा इस्तेमाल करेंगे। जिसे 1906 में जर्मन मानचित्रकार मैक्स एकर्ट ने विकसित किया था।






