सुबह की पहली चाय के साथ लैपटॉप का बटन ऑन होने से लेकर देर रात तक बजती ऑफिस की ईमेल टोन… आज के दौर में नौकरी पेशा लोगों के लिए यह एक आम दिनचर्या बन चुकी है। काम का तय समय खत्म होने के बाद भी लंच ब्रेक में मीटिंग्स निपटाना, वीकेंड पर क्लाइंट कॉल्स उठाना या देर रात तक पीपीटी बनाना अब पेशेवर जिंदगी का अनकहा हिस्सा बन गया है। लेकिन जब इस ‘अतिरिक्त मेहनत’ के बदले जेब में एक पैसा भी न आए, तो इसे निष्ठा नहीं बल्कि शोषण कहा जाता है।
ग्लोबल ह्यूमन रिसोर्स कंपनी एडीपी (ADP) की हालिया रिपोर्ट पीपल एट वर्क 2026 में सामने आया है कि बिना किसी अतिरिक्त भुगतान या भत्ते के काम कराने के मामले में भारत दुनिया में पहले पायदान पर पहुंच गया है।
आंकड़ों में डरावना सच
36 देशों के 39 हजार से ज्यादा कर्मचारियों पर किए गए इस व्यापक सर्वे के नतीजे भारतीय वर्क-कल्चर की पोल खोलते हैं. भारत में 24% कर्मचारी हर हफ्ते 16 घंटे या उससे ज्यादा का काम बिना किसी अतिरिक्त सैलरी या भत्ते के करते हैं। इसका मतलब है कि हर 100 में से 24 लोग अपनी क्षमता से एक पूरे दिन से ज्यादा का काम मुफ्त में दे रहे हैं। देश के करीब 40% कर्मचारी हर हफ्ते 6 से 15 घंटे का ओवर-टाइम करते हैं जिसके लिए उन्हें कोई एक्स्ट्रा पेमेंट नहीं मिलता। कुल मिलाकर देखा जाए तो भारत के लगभग दो-तिहाई (64% से अधिक) कर्मचारी हर हफ्ते कम से कम 6 घंटे का काम बिना पैसों के करने को मजबूर हैं।
दुनिया के अन्य देशों की तुलना करें तो भारत की स्थिति सबसे ज्यादा गंभीर और चिंताजनक है।
- भारत: 24% (नंबर-1)
- तुर्की: 23%
- ऑस्ट्रेलिया: 21%
- अमेरिका: 20%
- चीन, ताइवान और जापान: केवल 6%
- चेक रिपब्लिक: 4% (सबसे कम)
जहाँ चीन और जापान जैसे देशों में यह आंकड़ा मात्र 6% है, वहीं भारत में 24% होना दिखाता है कि हमारे यहाँ कर्मचारियों के ‘पर्सनल टाइम’ की कोई कद्र नहीं है।
रिपोर्ट से पता चलता है कि पद जितना बड़ा होता है, मुफ्त काम का दबाव उतना ही बढ़ जाता है। कंपनियों में सीनियर लीडर्स और मैनेजर्स को जिम्मेदारी के नाम पर लगातार अनपेड ओवर-टाइम करना पड़ता है।
वहीं, महामारी के बाद ‘वर्क फ्रॉम होम’ या हाइब्रिड मॉडल में काम करने वाले लोगों की हालत ऑफिस जाने वालों से ज्यादा खराब है। घर से काम करने का मतलब कम काम नहीं, बल्कि वर्क-लाइफ बैलेंस का पूरी तरह से बिगड़ना बन चुका है, जहाँ ऑफिस के घंटे खत्म होने की कोई स्पष्ट सीमा रेखा नहीं बचती।
एडीपी की स्टडी साफ करती है कि बिना पैसों के ज्यादा देर तक काम कराने का मतलब बेहतर आउटपुट बिल्कुल नहीं है। जो कर्मचारी लगातार लंबे अनपेड आवर्स में काम करते हैं, वे मानसिक रूप से थक जाते हैं और अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पाते।






